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चालबाजियाँ, धोखे-छल… ये हजारों वर्षों से चली आ रही प्रथाएँ आज भी बार-बार दोहराई जा रही हैं। क्या आप इस समाज की इन प्रथाओं के अनुकूल हो पाए हैं? अनुकूलन तो जरूर ही होना चाहिए… बस इसकी गहराई का सवाल है। जब कोई व्यक्ति हर चीज़ में खुद को ढाल लेता है, तो सब कुछ ठीक हो जाता है! वरना… हे हे! सहपाठियों का समूह, दोस्तों का समूह, परिवार का समूह, सहकर्मियों का समूह… हर समूह तो किसी विशेष उद्देश्य हेतु ही बनता है। लेकिन एक ऐसा भी समूह है, जिसमें चाहे आप कितनी भी कोशिश करें, वह समूह आपको अपने अंदर शामिल होने की अनुमति ही नहीं देता! वृत्त, वृत्त, वृत्त… क्या आप उलझन में पड़ गए हैं? काम को और अधिक सुखद बनाने, एवं बेहतर जीवन जीने हेतु, आपको कुछ समूहों में शामिल होना ही होगा। केवल ही समूहों में ही आपको वह जानकारी एवं खुशी प्राप्त हो सकती है, जिसकी आपको आवश्यकता है। ऐसा लगता है कि यह एक “घेरा” है… जिसमें घुसना चाहने वाले अंदर नहीं जा पाते, और जो अंदर पहले से ही हैं, वे बाहर निकलना चाहते हैं। इंसान वाकई अजी जो चीज़ प्राप्त नहीं हो पाती, उसे पाने हेतु हर संभव तरीका आजमाया जाता है। लेकिन जब वह चीज़ प्राप्त हो जाती है, तो लगता है कि वह तो कुछ खास ही नहीं है। यह कोई बड़ी बात नहीं है। आप किस तरह के समूह/वर्ग में शामिल हैं, इसका मतलब यह है कि आपका भविष्य में विकास उस समूह से जुड़े लोगों एवं घटनाओं के इर्द-गिर्द ही होगा। जो लोग मालिक बनने की कोशिश करते हैं, वे एक दिन जरूर मालिक बन ही जाते हैं; लेकिन जो लोग गुंडागर्दी करते हैं, वे एक दिन जरूर जेल में जा ही पहुँचते हैं। जिनके